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कविता:- कितनी कोशिशें !!??

कविता:- कितनी कोशिशें !!??  कितनी कोशिशों कीं तेरे नाम को ज़ुबां पर न लाने  की, काश एक कोशिश तुझे  पुकारने की की होती, तो ज़िंदग़ी कुछ और  होती। कितनी कोशिशें कीं तेरी आँखों से छलकते प्यार को नकारने की, काश एक कोशिश आँखों में डूबने की की होती, तो जिंदग़ी कुछ और होती। कितनी कोशिशें कीं तेरी चाप सुनकर रास्ते बदलने की, काश एक कोशिश तेरे साथ चलने की की होती, तो ज़िंदग़ी कुछ और होती। कितनी कोशिशें कीं तेरी आमद-ए-महफ़िल से कतराने की, काश एक कोशिश शिरकत की की होती,  तो  ज़िंदग़ी कुछ और होती। कितनी कोशिशें की अपने दिल में बसे तेरे प्यार को झुठलाने की, काश एक कोशिश इसे तेरे दिल की राह बताने की की होती, तो ज़िंदग़ी कुछ और होती। कितनी कोशिशें कीं उमंगों के पर कतरने की, काश एक कोशिश इनको परवाज़ देने की की होती, तो ज़िंदग़ी कुछ और होती। कितनी कोशिशें कीं तुझसे दूर जाने की, काश एक कोशिश पास आने की की होती, तो ज़िंदग़ी कुछ और होती। अनिता जैन weekendshayar. Blogspot.in 
कविताः तुझको दुआ देता हूँ , खुद बरबाद हुए जाता हूँ । झरता है तू आखों के प्यालो से, बसता है पलकों के शामियाने में । प्यार इस कदर करता हूँ कि, हर खुशी तुझे नज़र किए जाता हूँl तुझको दुआ देता हूँ,खुद बरबाद हुए जाता हूँl जाता हूँ दर पे ख़ुदा की अपने हाल पर रहम माँगने, पर झुकते ही सर सजदे में,तेरे ही हक में इबादत किये जाता हूँl तुझको दुआ देता हूँ,खुद बरबाद हुए जाता हूँl वादा करता हॅूँ हर रात खुद से न देखूँगा तुझे ख्वाबों  में, पर पलक मूंदते ही हर ख्वाब तेरे ही नाम किए जाता हॅूँl तुझको दुआ देता हॅूँ, खुद बरबाद हुए जाता हूँ। तेरे संग तय की राहों पर चाहता नहीं चलना, पर हर राह पर तेरे नक्श- ए- कदमों की तलाश किए जाता हूँl तुझको दुआ देता हॅूँ,खुद बरबाद हुए जाता हूं। कभी ज़िक्र नहीं होता तेरा मेरे कामों की फ़ेहरिस्त में, पर अनचाहे अनजाने ही अपने शामो - सहर तेरे नाम किए जाता हूँl तुझको दुआ देता हूँ,खुद बरबाद हुए जाता हॅूँl सोचता हूँ तुझको,चाहता हॅूँ तुझको हर वक्त बेख़याली में, पर इस गिरह से  फिर भी आज़ाद होने की कोशिश किए जाता हूँl तुझको दुआ देता हूँ , खुद बरबाद हुए ...

तू मुझे याद आता रहा।

कविताः तू मुझे याद आता रहा।  मैं तेरे दिल की सुनता रहा,तू मेरे दिल की सुनता रहा।  आँखों की बोली तू मेरी मैं तेरी समझता रहा। जाने मुहब्बत थी या वक़्ती जज़्बा जिसे दिल प्यार समझता रहा। कोई वजन- ओ - पैमाइश नहीं मुहब्बत में,मैं तुझे तू मुझे 'बहुत' चाहता रहा। मुहब्बत दिल का भरम है,ये दुनिया को समझाता रहा। अरे करो तो दुनिया में क्या काम कम है, ये सिखाता रहा। पर खुद अपना दिल ही बेवफ़ा निकला,अपनी मनमानी करता रहा। मैं फ़र्ज़परस्ती का फ़साना सुनाता रहा, ये मुहब्बत के नग़मे गाता रहा। शर्म के हिजाब में कैद हो पल्लू की गिरहें बाँधता खोलता रहा।झुकी पलकों से इज़हार किया ज़ुबान से इनकार करता रहा। जा न सका दूर तुझसे हर कोशिश जाने की करता रहा। बिन कहे- सुने तू चल पड़ा मैं ताकता रहा,तू दूर जाता रहा। मुहब्बत की किस्मत मैं जुदाई और नाकामी लाज़मी है,खुद को समझाता रहा। अच्छा हुआ लुका-छिपी का ये सिलसिला खत्म हुआ, दिल को मनाता रहा। आज़ादी मना कि,एक फलसफ़ा खत्म  हुआ, ये दोहराता रहा।पर झ्क पल  को भी न ये फसाना खत्म हुआ, तू मुझे याद आता रहा, तू मुझे याद आता रहा।  -अनिता ज...

इस जहाँ से किनारा कर लूँ

इस जहाँ से किनारा कर लूँ जिंदगी का सफ़र तन्हा मुश्किल लगता है मुझ को, आ कि,हमसफ़र तेरा हाथ थामकर जहाँ से किनारा कर लूँl पथरीली राहों में डगमगाऊँ तो तू थाम ले मुझको, आ कि,सर तेरे काँधे पे रखके शाम को सहर कर लूँl इज़हार- ए -मुहब्बत न करूँ ज़ुबां से तू खुद ही समझ ले मुझको, आ कि, इस जहाँ से चुराकर तुझे निगाहों में भर लूँl जिंदग़ी के दिए ज़ख्मों से दिल जो दर्द दे मुझको, आ कि, चार अश्क तेरे काँधों पे बहा के मैं सुकून कर लूँl तू साथ होता है तो हर राह आसान लगती है मुझको, आ कि, भुलाकर शिकवे -गिले सफर -ए-ज़िंदग़ी तेरे संग तय कर लूँl जो ख़ुशियाँ दामन में भर-भर कर दी तूने मुझको, आ कि,उनसे चमन सजाके अपना अपने नसीब पर फ़क्र कर लूँl मेरे घोंसले के नन्हें परिंदे उड़ चले अपना नशेमन बसानेको, आ कि, तुझसे गुफ्तगू कर उनका बचपन याद कर लूँl आ कि, तेरा हाथ थामकर जहाँ से किनारा कर लूँl  अनिता जैन weekendshayar.blogspot.in

कविताः हमेशा के लिए सो जाने दो

कविताः हमेशा के लिए सो जाने दो  झूठी हँसी में लिपटे तेरे-मेरे अश्कों की नुमाइश बहुत हुई।तबाह जिस्मो - रूह के सायों से ज़िंदग़ी के गुलशन  की बरबादी बहुत  हुई। दिल कहता है अब बेमौसम बादल बरस जाने की रुत आने दो।  बेताबी कहती है अब खयालों के जंगलों से हकीकतों के रास्ते तय पा जाने दो ।  तड़पते अरमानों की झुलसती आग मेें खुद को झोंकने की कवायद बहुत हुई। बेलौस बहते आँसुओं के दरिया में दरो- दीवार के साथ डूब जाने की कोशिश बहुत हुई। माथे की शिकन मिटाकर कोयल के मीठे नग़मे के साथ प्यार का साज़ बज जाने दो। मुस्कुराकर लाल पीले फूलों को इन ज़ुल्फ़ों में सज जाने दो बारिश के मौसम के साथ आँसुओं के सैलाब बहा लेने  की रवायत बहुत हुई। हँसते - गाते पंछियों के सुर में अपनी आहें मिलाकर छुपाने की नाकाम साज़िश बहुत हुई।  तुम्हारी जुदाई का ग़म  सहकर मैं ज़िंदा हॅूँ इस बात की दावत हो जाने दो। मुझसे बिछड़ कर तुम खुश और आबाद हो इस बात का जश्न हो जाने दो।  टूटे दिल  की  धमक से मुरझाए चेहरे को झूठे श्रृंगार से सजाने  की तकलीफ़ बहुत हुई।  ...

Dard e ishq

कविता : दर्द - ए-इश्क दर्द- ए - इश्क जो दिल की गहराई में पैबस्ता है, उसे अश्कों में बहा लूँ कि, तेरी बेरुखी का खंजर इस दिल कॊ नज़र कर दे । तेरी पलकों से झरते आँसुओं को अपने दामन में समेट लूँ कि, बेधड़क तेरे अश्क मेरे दिल  को  नज़र कर दे । झूठी  ही सही दिखावे की ही सही ऐ मग़रूर आ कि, इक मुस्कुराहट तो इस चेहरे  को नज़र करदे। टूटे आईने के टुकड़ों से इस दिल में बाग़ुरूर ही झाँक ले ज़रा, ये भरम ही सही अपनी परछाई तो इस टूटे दिल को नज़र कर दे । तेरी राह में बिछी मेरी पलकों से ख़्वाब चुराकर रोशन करले अपना जहाँ , बदले में अपनी ज़िंदग़ी के अँधेरे इन आँखों को नज़र करदे। अनिता जैन weekendshayar.blogspot.in and weekendshayar.com 

सफ़र - ए-मुहब्बत

सफ़र - ए-मुहब्बत : - आ इस तरह तुझसे बात करें कि, तुझे लफ्ज़ों में ढालें पर लफ़्ज़ों को ज़ुबां न दें। आ इस तरह तुझसे बात करें। आ इस तरह तेरा दीदार करें कि, तुझे आँखों में बसाएं पर तुझी से आंखें चार न करें। आ इस तरह तेरा दीदार करें। आ इस तरह तुझसे मुलाकात करें कि, हर जगह तेरी ही बात करें पर तुझी से बात न करें। आ इस तरह तुझसे मुलाकात करें। आ इस तरह तुझे दुआओं में सजाएं कि, दिन - रात तेरी खैरियत रब से माँगें पर तुझसे ही तेरी ख़ैरियत न पूछें। आ इस तरह तुझे दुआओं में सजाएं । आ इस तरह सफ़र - ए -मुहब्बत तय करें कि, तुझे दिल में क़ैद करलें पर तुझीसे मुहब्बत का इज़हार न करें। आ इस तरह सफ़र -ए - मुहब्बत तय करें। अनिता जैन @ weekendshayar.blogspot.in and weekendshayar.com